दिनांक:14/11/2025
राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला में मीडिया एवं सांस्कृतिक विरासत पर केंद्रित कार्यशाला का पाँचवाँ दिन ज्ञानवर्धक सत्रों के नाम ।
डिग्री कॉलेज धर्मशाला में आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) एवं मीडिया लिटरेसी क्लब द्वारा आयोजित एक सप्ताहिक कार्यशाला Reel, Real and Represented: Media and Cultural Imagination के पाँचवें दिन रोचक, संवादपरक और अत्यंत जानकारीपूर्ण सत्र आयोजित किए गए।
सुबह के सत्र में द ट्रिब्यून के संवाददाता राघव गुलेरिया तथा फोटो जर्नलिस्ट कमलजीत विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। मुख्य वक्ता राघव गुलेरिया ने कांगड़ा क्षेत्र की समृद्ध कला-संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहरों, लोक परंपराओं और पहाड़ी पहचान पर मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मीडिया कलाकारों, लोक संगीतकारों, कारीगरों और मिनिएचर पेंटर्स को स्थानीय सीमाओं से बाहर व्यापक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाता है। उन्होंने मस्रूर रॉक कट मंदिर, बाथू की लड़ी, गुलैर शासकों की धरोहर इमारतें और नैनसुख की कलाकृतियों के संरक्षण में मीडिया की जिम्मेदारी पर भी विस्तृत चर्चा की। गुलेरिया ने विद्यार्थियों को कांगड़ा क्षेत्र की समृद्ध कला-संस्कृति, भव्य मंदिरों, लोक-परंपराओं, पहाड़ी पहचान और ऐतिहासिक धरोहरों पर मीडिया की भूमिका के बारे में गहन जानकारी दी। उन्होंने कहा कि मीडिया कलाकारों, मिनिएचर पेंटर्स, लोक संगीतकारों और स्थानीय कारीगरों को वैश्विक पहचान दिलाने का सशक्त माध्यम है। खोजी रिपोर्टिंग ऐतिहासिक धरोहरों की उपेक्षा, अतिक्रमण और पर्यटन के दुष्प्रभाव जैसी गंभीर समस्याओं को उजागर कर सकती है। मस्रूर रॉक कट मंदिर, बाथू की लड़ी, गुलैर शासकों की धरोहर इमारतें तथा नैनसुख जैसे महान चित्रकार की कलाइन सभी को संरक्षित करने में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि पारंपरिक एवं डिजिटल मीडिया आज कांगड़ा की सांस्कृतिक विरासत के संवाहक बन चुके हैं,जो न केवल परंपराओं को दस्तावेज़ित करते हैं, बल्कि पर्यटन को बढ़ावा देकर कलाकारों को सशक्त भी बनाते हैं।
दोपहर के सत्र में डॉ. प्रवेश गिल ने मीडिया का उपभोक्ता व्यवहार पर प्रभाव विषय पर संबोधित किया। उन्होंने बताया कि विज्ञापनों, सोशल मीडिया, इन्फ्लुएंसर्स और फिल्मों के माध्यम से मीडिया लोगों की पसंद, जरूरतों और इच्छाओं को गहराई से प्रभावित करता है। उपभोक्ता अक्सर वस्तुओं का चयन उनके वास्तविक उपयोग से अधिक, मीडिया द्वारा निर्मित छवि के आधार पर करते हैं। मीडिया केवल उत्पाद नहीं बेचता, बल्कि उनके साथ भावनाएँ, पहचान, सामाजिक प्रतिष्ठा और जीवनशैली भी जोड़ देता है। उपभोक्ता कई बार वस्तु की वास्तविक आवश्यकता से अधिक, मीडिया द्वारा निर्मित छवि और मूल्यबोध के आधार पर निर्णय लेते हैं।
अंतिम सत्र में डॉ. दीप्ति का ठाकुर की अध्यक्षता में पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। पैनल में डॉ. मोनिका मक्कर, प्रोफेसर पूजा दीवान, डॉ. नीरज कौशल, प्रोफेसर ज्योति बाला, डॉ. हर्ष दीपिका दत्ता और डॉ. पल्लवी शर्मा शामिल रहीं। पैनलिस्टों ने मीडिया द्वारा जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को प्रस्तुत करने के तरीकों, उसके प्रभाव और चुनौतियों पर विचार साझा किए। चर्चा में यह निष्कर्ष निकला कि मीडिया न केवल जलवायु परिवर्तन की रिपोर्टिंग करता है, बल्कि इस विषय पर समाज की समझ, भावनाओं और नीतिगत प्राथमिकताओं को भी आकार देता है।
पूरे दिन चले सत्र अत्यंत उपयोगी और ज्ञानवर्धक रहे तथा विद्यार्थियों ने मीडिया, समाज और संस्कृति के सूक्ष्म संबंधों को समझने के साथ-साथ समसामयिक विषयों पर सार्थक चर्चा में सक्रिय भागीदारी निभाई। इस अवसर पर इस अवसर पर आयोजन समिति के संयोजक (Convener) डॉ. विक्रम श्रीवत्स तथा कार्यशाला के सह-संयोजक डॉ. शैली पारुल व डॉ आरती चंदेल डॉ. पर्वेश गिल, डॉ. मोनिका मक्कर, प्रोफेसर पूजा दीवान, डॉ. नीरज कौशल, प्रोफेसर ज्योति बाला, डॉ. हर्ष दीपिका दत्ता और डॉ. पल्लवी शर्मा, डॉ सुमन, डॉ सोनम, प्रोफेसर राधे श्याम, डॉ. श्रुति, तरसेम जरयाल सहित विद्यार्थी उपस्थित रहे। इन सभी ने मुख्य अतिथि और मुख्य वक्ता को स्मृति चिन्ह एवं रोज़ेट भेंट कर सम्मानित किया तथा कार्यशाला की सफलता की शुभकामनाएँ दीं
