HamroClass Preloader

 दिनाक: 07/10/2026

राजकीय महाविधालय धर्मशाला में वन्यजीव संरक्षण, जैव विविधता एवं इको-टूरिज्म पर विद्यार्थियों को दी महत्वपूर्ण जानकारी

हिमालय की जैव विविधता बनी विद्यार्थियों के ज्ञान का केंद्र

विदेशों से हिमालय और पोंग झील तक पहुंचने वाले प्रवासी पक्षियों से लेकर जहरीले सांपों की पहचान एवं बचाव के बताए उपाय

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय धर्मशाला के विभाग ऑफ वोकेशनल स्टडीज (वी-वॉक) द्वारा वन्यजीव सप्ताह के अवसर पर विद्यार्थियों के लिए वन्यजीव संरक्षण, जैव विविधता एवं इको-टूरिज्म विषय पर अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक व्याख्यान का आयोजन किया गया। वन्यजीव सप्ताह 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर 2026 तक मनाया जा रहा है। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को हिमाचल की समृद्ध जैव विविधता, वन्यजीवों की पहचान, उनके संरक्षण तथा प्रकृति आधारित जिम्मेदार पर्यटन के महत्व से परिचित करवाना रहा।

कार्यक्रम में उड़नदस्ता मंडल (उत्तर), धर्मशाला वन विभाग से वन मंडलाधिकारी देविंदर सिंह डढ़बाल मुख्य वक्ता तथा **उप वनपाल (डिप्टी रेंजर ऑफिसर), उड़नदस्ता मंडल (उत्तर), धर्मशाला मेघ राज ठाकुर विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

मुख्य वक्ता वन मंडलाधिकारी देविंदर सिंह डढ़बाल ने विद्यार्थियों को हिमाचल प्रदेश की समृद्ध वन्यजीव एवं पक्षी विविधता के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने विभिन्न वन्यजीवों, पक्षियों, सरीसृपों तथा उनके प्राकृतिक आवासों के बारे में प्रस्तुति के माध्यम से जानकारी साझा करते हुए बताया कि प्रत्येक जीव प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और किसी एक प्रजाति का संरक्षण पूरे पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक है।

विदेशों से हिमालय और पोंग झील तक पहुंचते हैं प्रवासी पक्षी

व्याख्यान का एक महत्वपूर्ण एवं आकर्षक विषय प्रवासी पक्षी रहे। विद्यार्थियों को बताया गया कि प्रत्येक वर्ष सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करके विभिन्न प्रवासी पक्षी हिमालयी क्षेत्रों और पोंग झील जैसे आर्द्रभूमि क्षेत्रों में पहुंचते हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के **बतख, हंस, जलपक्षी, बगुले, सारस तथा अन्य प्रवासी पक्षी शामिल होते हैं।

इनमें से अनेक पक्षी ठंडे क्षेत्रों से भोजन और अनुकूल जलवायु की तलाश में हिमाचल पहुंचते हैं तथा कुछ समय यहां बिताने के बाद पुनः अपने मूल क्षेत्रों की ओर लौट जाते हैं। पोंग झील प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक आश्रय स्थल है, जिसके कारण देश-विदेश से पक्षी प्रेमी, प्रकृति प्रेमी, पर्यटक और पक्षी-दर्शन में रुचि रखने वाले लोग यहां पहुंचते हैं। विद्यार्थियों को समझाया गया कि इस प्रकार हिमाचल की जैव विविधता न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि प्रकृति एवं वन्यजीव आधारित पर्यटन को भी बढ़ावा देती है।

पक्षियों की पहचान से लेकर उनके संरक्षण तक दी जानकारी

व्याख्यान के दौरान विभिन्न पक्षी प्रजातियों के चित्र और स्लाइड दिखाकर विद्यार्थियों को उनकी पहचान, रंग-रूप, आकार, चोंच, पंख, आवास तथा व्यवहार के आधार पर उन्हें पहचानने की जानकारी दी गई। विद्यार्थियों को बताया गया कि पक्षियों को देखने के दौरान उनके प्राकृतिक व्यवहार में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए तथा उनके आवासों को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए।

मुख्य वक्ता ने बताया कि हिमालय, धौलाधार पर्वत श्रृंखला, वन क्षेत्रों, नदियों, झीलों और आर्द्रभूमियों में वन्यजीवों और पक्षियों की अत्यंत समृद्ध विविधता पाई जाती है। यही प्राकृतिक संपदा हिमाचल को प्रकृति प्रेमियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का महत्वपूर्ण केंद्र बनाती है।

सांपों की पहचान और जहरीले सांपों से बचाव के बताए उपाय

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार के सांपों के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई। विद्यार्थियों को बताया गया कि सांपों की सभी प्रजातियां जहरीली नहीं होतीं और बिना सही जानकारी के किसी भी सांप को देखकर घबराना या उसे मारना उचित नहीं है।

व्याख्यान के दौरान रस्सेल वाइपर का जीवित प्रदर्शन भी करवाया गया। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को जहरीले सांप की पहचान, उसके व्यवहार, प्राकृतिक आवास तथा उससे सुरक्षित रहने के उपायों की जानकारी दी गई। विद्यार्थियों को समझाया गया कि सांप दिखाई देने पर उससे उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए, उसे छेड़ना या पकड़ने का प्रयास नहीं करना चाहिए तथा प्रशिक्षित वन विभाग या विशेषज्ञों की सहायता लेनी चाहिए।

साथ ही विद्यार्थियों को यह भी बताया गया कि सांप के काटने की स्थिति में झाड़-फूंक, चीरा लगाने या घरेलू उपचार करने के बजाय पीड़ित को तत्काल चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाना चाहिए। इस जानकारी के माध्यम से विद्यार्थियों में वन्यजीवों के प्रति भय के बजाय जागरूकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास किया गया।

वन्यजीवों की पहचान और संरक्षण पर विशेष जोर

मुख्य वक्ता ने विभिन्न वन्यजीव प्रजातियों की पहचान, उनके आवास, भोजन, व्यवहार और पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका के बारे में भी जानकारी दी। विद्यार्थियों को बताया गया कि वन्यजीव केवल जंगलों की शोभा नहीं हैं, बल्कि वे प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला, परागण, बीज प्रसार, वन पुनर्जनन और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वन्यजीवों को देखने और उनके प्राकृतिक आवासों में भ्रमण के दौरान जिम्मेदार पर्यटक की भूमिका निभाएं। वन क्षेत्रों में प्लास्टिक और कूड़ा न फैलाना, तेज आवाज न करना, वन्यजीवों को भोजन न देना तथा उनके प्राकृतिक आवास में अनावश्यक हस्तक्षेप न करना प्रत्येक पर्यटक की जिम्मेदारी है।

वन्यजीव संरक्षण से जुड़ा है इको-टूरिज्म का भविष्य

व्याख्यान में वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन के बीच संबंध पर भी विस्तार से चर्चा की गई। वक्ता ने बताया कि हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक संपदा, हिमालय और धौलाधार की पर्वत श्रृंखलाएं, वन क्षेत्र, नदियां, झीलें तथा पोंग झील जैसे आर्द्रभूमि क्षेत्र इको-टूरिज्म की अपार संभावनाएं रखते हैं।

यदि प्राकृतिक संसाधनों और वन्यजीवों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाए तो इन्हीं क्षेत्रों में पक्षी-दर्शन, प्रकृति भ्रमण, वन्यजीव पर्यटन और पर्यावरण शिक्षा जैसी गतिविधियों को जिम्मेदार एवं सतत तरीके से विकसित किया जा सकता है। इससे स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं और पर्यटकों को प्रकृति के करीब आने का अवसर मिल सकता है। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को वन्यजीवों की पहचान, प्रवासी पक्षियों के आवागमन, सांपों से सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण तथा जिम्मेदार इको-टूरिज्म के प्रति जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस अवसर पर प्रशिक्षक तरसेम जरयाल ने मुख्य वक्ता एवं विशिष्ट अतिथि का स्वागत किया तथा कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया।

कार्यक्रम में डॉ. दीपिका ठाकुर, प्रशिक्षक कपिल शर्मा, प्रशिक्षक अंशुल राणा, रोहित सभरवाल, तरसेम जरयाल, दर्शना ठाकुर, हितेश शर्मा सहित वी-वॉक विभाग के विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए केवल एक व्याख्यान तक सीमित न रहकर वन्यजीवों की पहचान, पक्षी विविधता, प्रवासी पक्षियों के आवागमन, सांपों की पहचान एवं उनसे सुरक्षा, जैव विविधता, वन्यजीव संरक्षण तथा इको-टूरिज्म को समझने का महत्वपूर्ण अवसर साबित हुआ। व्याख्यान ने विद्यार्थियों में यह संदेश भी मजबूत किया कि प्रकृति और वन्यजीवों का संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है।