दिनाँक: 31/08/2026
हिमालयी लोक कलाओं का संरक्षण हमारी सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए जरूरी : विनय धीमान
राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला में ‘हिमालयन सांस्कृतिक विरासत संरक्षण एवं विकास’ पर ओरिएंटल वर्कशॉप का शुभारंभ
हिमालयी क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक लोक कलाओं एवं लोक परंपराओं के संरक्षण और युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के उद्देश्य से राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला के प्रयास भवन में शनिवार को हिमालयन सांस्कृतिक विरासत संरक्षण एवं विकास’ विषय पर ओरिएंटल वर्कशॉप का शुभारंभ हुआ। कार्यशाला का आयोजन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के तत्वावधान एवं राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला के सहयोग से ‘यूथ डेवलपमेंट सेंटर’ द्वारा किया जा रहा है।
कार्यशाला का शुभारंभ मुख्य अतिथि हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग के उपनिदेशक विनय धीमान (हि.प्र.से.) ने दीप प्रज्वलित कर किया। कार्यक्रम की शुरुआत महाविद्यालय के संगीत विभाग की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना एवं स्वागत गीत से हुई। इस अवसर पर महाविद्यालय की ओर से मुख्य अतिथि का औपचारिक स्वागत एवं परिचय डॉ. आरती चंदेल ने प्रस्तुत किया।
अपने संबोधन में विनय धीमान ने हिमालयी क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता और पारंपरिक लोक कलाओं के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत अपनी सांस्कृतिक विविधता, प्राचीन इतिहास और समृद्ध परंपराओं के लिए विश्वभर में विशिष्ट पहचान रखता है। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र की लोक कलाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि यहां के समाज, जीवनशैली, प्रकृति, आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। इनका संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण दायित्व है।
विनय धीमान ने अपने हिमाचल के विभिन्न पर्यटन एवं जनजातीय क्षेत्रों, विशेषकर चंबा, कांगड़ा और भरमौर के अनुभव विद्यार्थियों के साथ साझा किए। उन्होंने बताया कि इन क्षेत्रों की यात्रा के दौरान उन्होंने वहां की विशिष्ट लोक परंपराओं, कला, संस्कृति और स्थानीय जीवन को करीब से समझा है। उन्होंने कहा कि आज बदलते समय के साथ संस्कृति के स्वरूप में विविधता और परिवर्तन आ रहा है, ऐसे में युवाओं की भूमिका अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान को सहेजने में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे हिमालयी लोक कलाओं, लोक संगीत, लोक नृत्य, पारंपरिक शिल्प एवं स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को केवल कार्यक्रमों तक सीमित न रखें, बल्कि इनके अध्ययन, दस्तावेजीकरण और संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाएं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. राकेश पठानिया ने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला को इस महत्वपूर्ण कार्यशाला की मेजबानी का अवसर प्रदान करने के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय के शताब्दी वर्ष में इस प्रकार की कार्यशाला का आयोजन विद्यार्थियों के लिए विशेष महत्व रखता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की प्राचीनता, विविधता और निरंतरता इसे विश्व की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत बनाती है।
प्राचार्य ने कहा कि हिमालयी पारंपरिक लोक कलाएं हमारी रीति-रिवाजों, लोक जीवन, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और सामुदायिक मूल्यों का अनमोल हिस्सा हैं। इनके माध्यम से युवा अपनी जड़ों से जुड़ते हैं और क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को समझते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी समान महत्व दें।
कार्यशाला के सफल आयोजन में महाविद्यालय के संगीत विभाग, रोवर-रेंजर, एनएसएस, टूर एंड ट्रैवल, यूथ एवं वोकेशनल स्टडीज तथा हॉस्पिटैलिटी एंड टूरिज्म विभाग के विद्यार्थियों ने विशेष सहयोग प्रदान किया।
इस अवसर पर प्राचार्य प्रो. राकेश पठानिया, विनय धीमान, डॉ. हर्ष दीपिका दत्ता , डॉ. आरती चंदेल, डॉ पल्लवी शर्मा, डॉ. शैली डडभाल, डॉ. दीपिका ठाकुर, डॉ. अमित कटोच, डॉ. अजय जम्वाल, प्रो. बालक राम, प्रो. संजय, प्रो गौरव महाजन, प्रो. शिखा शर्मा, दर्शना, तरसेम जरयाल सहित महाविद्यालय के शिक्षकगण एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
कार्यशाला के दौरान प्रख्यात लोक कलाकार एवं प्रशिक्षक जितेन्द्र कुमार सहित अन्य विशेषज्ञों द्वारा हिमालयी सांस्कृतिक विरासत एवं पारंपरिक लोक कलाओं से संबंधित विषयों पर विद्यार्थियों को प्रशिक्षण एवं व्यावहारिक जानकारी प्रदान की जाएगी।
