दिनांक: 22/09/2025
धर्मशाला में टूरिज़्मो त्रिगर्त कार्निवाल के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन ।
राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला के सभागार में आज टूरिज़्मो त्रिगर्त कार्निवाल के बैनर तले एक भव्य अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का विषय था Ancient Interactions: Greece, Portugal, and the Kangra जिसमें ग्रीस, पुर्तगाल और कांगड़ा के बीच प्राचीन सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संबंधों पर गहन चर्चा हुई।
कार्यक्रम का शुभारम्भ माँ सरस्वती वंदना और द्वीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके उपरांत प्राचार्य प्रो. राकेश पठानिया ने मुख्य अतिथियों को स्मृति चिन्ह, शाल, टोपी और बुके भेंट कर सम्मानित किया।
यह आयोजन महाराजा संसार चंद्र संग्रहालय एवं राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। इसमें महाराजा ऐश्वर्य कटोच, लम्बाग्रां (कांगड़ा) ने मुख्य संरक्षक (Chief Patron) के रूप में भाग लेकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। कार्यक्रम के संरक्षक (Patron) प्रो. राकेश पठानिया, प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला रहे।
प्राचार्य प्रो. राकेश पठानिया ने महाराजा ऐश्वर्य कटोच के साथ-साथ टीका राज अंबिकेश्वर कटोच, टीका रानी कमलाकशी कटोच, प्रसिद्ध पुरातत्वविद् श्री जॉर्ज एंटोनियो रोमान, विख्यात इतिहासकार व लेखक अरुणांश बी. गोस्वामी, तथा डॉ. चेत राम, निदेशक ठाकुर राम सिंह इतिहास शोध संस्थान सहित अन्य गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया।
अपने विचार व्यक्त करते हुए महाराजा ऐश्वर्य कटोच ने कहा कि उनके पूर्वजों का हिमाचल के इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने कहा राजा अपने कर्म से राजा होता है और समाज के प्रति सदैव कर्तव्य निभाना ही सच्चा राजधर्म है।
कार्यशाला में मुख्य वक्ता (Key Speaker) के रूप में जॉर्ज एंटोनियो रोमान (पुरातत्ववेत्ता) ने विस्तार से अपने शोध प्रस्तुत किए। उनकी प्रस्तुति ग्रीस, पुर्तगाल और कांगड़ा के प्राचीन संबंधों पर केंद्रित थी। उन्होंने मेडुसा राजवंश (ऑल्टर डू चाओ, पुर्तगाल) में हाइडेस्पेस के युद्ध से संबंधित रोमन मोज़ेक पर प्रकाश डाला। यह मोज़ेक महान सिकंदर के जीवित बचे तीन मोज़ेकों में से एक है और सिकंदर व राजा पोरस को दर्शाने वाला एकमात्र मोज़ेक है।
एंटोनियो ने स्पष्ट किया कि यह मोज़ेक वास्तव में सिकंदर महान और महाराजा परमानंद चंद्र प्रथम (कटोच वंश के 280वें राजा), जिन्हें पौराणिक राजा पोरस के नाम से जाना जाता है, के बीच 326 ईसा पूर्व झेलम नदी के तट पर हुए हाइडेस्पेस के युद्ध को दर्शाता है।
उन्होंने बताया कि पोरस का राज्य झेलम और चिनाब नदियों के बीच फैला था, जिसमें लगभग तीन सौ नगर थे। यह क्षेत्र पंजाब के प्रसिद्ध जेच दोआब में आता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यह खोज अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मोज़ेक अच्छी तरह संरक्षित है और इसकी केवल 10% कलाकृतियाँ ही नष्ट हुई हैं। इसे पहली बार 2007 में खोजा गया और 2016 में इसका जीर्णोद्धार किया गया। यह शोध इस धारणा को चुनौती देता है कि भारत और पुर्तगाल का पहला संपर्क वास्को डी गामा के काल में हुआ था। वास्तव में यह संबंध चौथी शताब्दी ईस्वी में ही रोमन काल के एबेलटेरियम (ऑल्टर डू चाओ) निवासी द्वारा स्थापित किया गया था। इस अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में विद्यार्थी, शोधार्थी और प्राध्यापक बड़ी संख्या में शामिल हुए। साथ ही, गूगल मीट और फेसबुक पेज के माध्यम से भी प्रतिभागियों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. अमित कटोच ने कार्यशाला के महत्व पर प्रकाश डाला और सभी अतिथियों का स्वागत किया। मुख्य संयोजक टीम में डॉ अमित कटोच, नरेंद्र जम्वाल,प्रो निशेष कुमार, प्रो धीरज कटोच , प्रो सोनिका और प्रो तरसेम जरयाल शामिल रहे। इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. निशेष और प्रो. सोनिका ने आयोजन में विशेष योगदान दिया। इस अवसर पर मुख्य आयोजन टीम को भी सम्मानित किया गया, जिसमें प्रो. संजय पठानिया, डॉ. आरती चंदेल, प्रो. अंजलि, प्रो. हर्षा राणा, डॉ. शैली भड़वाल, डॉ. पूजा राजपूत, प्रो. धीरज कटोच, शिखा व्यास, तनूजा पराशर, रूपाली, अंशुल राणा, कपिल शर्मा, शैशव शर्मा और कनिका सूद शामिल रहे। केंद्रीय विश्विधालय हिमचाल प्रदेश से डॉ उदयभान सिंह, डॉ चन्दर शेखर, डॉ अर्चना कटोच,डॉ दीपांकर शर्मा, हिमाचल प्रदेश क्षेत्रीय केंद्र धर्मशाला से डॉ राज कुमार और डॉ राजिंदर यह विशेष कार्यशाला न केवल इतिहास प्रेमियों के लिए एक अद्वितीय अवसर सिद्ध हुई, बल्कि इसने कांगड़ा की प्राचीन धरोहर को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर क्षेत्र को गौरवान्वित किया। आयोजन ने यह संदेश दिया कि इतिहास की गहराइयों से जुड़े शोध हमारे वर्तमान और भविष्य को प्रेरित करने में सक्षम हैं। डॉ अमित कटोच, और तरसेम जरयाल ने संयोजक टीम का कार्यशाला को सफल बनाने के लिए आभार व्यक्त किया।
