दिनांक: 12/11/2025
राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला में रील, रियल और रिप्रेजेंटेड : मीडिया एंड कल्चरल इमेजिनेशन” कार्यशाला के तीसरे दिन विशेषज्ञों ने रखे अपने विचार ।
डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया और राष्ट्रीय पहचान पर हुए प्रेरक व्याख्यान
राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला में चल रही एक सप्ताहिक कार्यशाला रील, रियल और रिप्रेजेंटेड : मीडिया एंड कल्चरल इमेजिनेशन” के तीसरे दिन विभिन्न विद्वान वक्ताओं ने मीडिया की भूमिका, उसके सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक प्रभावों पर अपने विचार रखे।
यह कार्यशाला आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) तथा मीडिया लिटरेरी क्लब के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की जा रही है।
इस अवसर पर विभागाध्यक्ष डॉ. अंजना खर्वाल ने कहा कि आज के डिजिटल युग में मीडिया हमारे सोचने और समझने के तरीकों को प्रभावित कर रहा है। विद्यार्थियों को चाहिए कि वे मीडिया सामग्री को केवल उपभोग न करें, बल्कि उसके पीछे के विचार और उद्देश्य को समझें। इस प्रकार की कार्यशालाएँ विद्यार्थियों में समालोचनात्मक सोच विकसित करने में सहायक सिद्ध होती हैं।
कार्यशाला के संयोजक डॉ. विक्रम श्रीवत्स ने बताया कि तीसरे दिन का सत्र विद्यार्थियों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक रहा, जिसमें मीडिया और समाज के बदलते समीकरणों पर विस्तृत चर्चा हुई।
पहले सत्र में डॉ. रोशन लाल शर्मा ने डिजिटल मीडिया एंड पब्लिक ओपिनियन विषय पर प्रभावशाली व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया आज सार्वजनिक राय निर्माण का सशक्त माध्यम बन चुका है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, ऑनलाइन पोर्टल और डिजिटल कैंपेन समाज की राजनीतिक और सांस्कृतिक सोच को प्रभावित करते हैं।” उन्होंने चेताया कि इस त्वरित सूचना प्रवाह के युग में भ्रामक जानकारी और एल्गोरिदमिक पक्षपात जैसी चुनौतियों से सतर्क रहना आवश्यक है।
दूसरे सत्र में डॉ. मोनिका मक्कड़ ने सोशल मीडिया का युवाओं पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि “सोशल मीडिया युवाओं के आत्म-सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। आदर्श जीवनशैली की निरंतर तुलना युवाओं में तनाव, चिंता और आत्महीनता की भावना को जन्म देती है। उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया जहाँ आत्म-अभिव्यक्ति का मंच है, वहीं इसका अति प्रयोग नींद में कमी, एकाग्रता में गिरावट और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न करता है।
तीसरे सत्र में डॉ. शेली पारुल भदवाल ने राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रवाद और सामूहिक स्मृति के निर्माण में मीडिया की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मीडिया नागरिकों के मन में अपने राष्ट्र की छवि को गढ़ने का एक प्रमुख साधन है। समाचार, फ़िल्में और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म सामूहिक स्मृतियाँ और भावनाएँ निर्मित करते हैं जो राष्ट्रीय एकता और गर्व की भावना को सशक्त बनाती हैं। साथ ही, उन्होंने कहा कि मीडिया कभी-कभी चयनात्मक रूप से कुछ विचारधाराओं को प्रमुखता देता है, जिससे समाज में विविध दृष्टिकोणों की उपेक्षा हो सकती है।
इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. राकेश पठानिया, वाइस प्रिंसिपल डॉ. संजय पठानिया, संयोजक डॉ. विक्रम श्रीवत्स, आयोजन समिति के सदस्य डॉ बलराज, डॉ आशीष रंजन, प्रो गोविन्द, डॉ. शैफाली पारुल भड़वाल, प्रो. दीपिका ठाकुर, डॉ. आरती चंदेल, डॉ. ऋतु बाला , डॉ हर्ष दीपिका दत्ता, डॉ बिटू कुमारी, डॉ. श्रुति, डॉ. स्नेहलता, प्रो तरसेम जरयाल उपस्थित रहे।
कार्यशाला का तीसरा दिन विद्यार्थियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक सिद्ध हुआ। उपस्थित विद्यार्थियों ने वक्ताओं से संवाद करते हुए मीडिया और संस्कृति के विविध आयामों पर गहन चर्चा की।
